चलती के सब हैं प्यारे !

(तर्ज : तुम छलियाँ बनके आना...)
चलती के सब हैं   प्यारे  !
बिगड़ी को कौन सुधारे । 
कोई मिले,सखी के लाल भले ! ।।टेक।।
जबतक ज्वानी का भर है ।
तबतक ही नारी तर हे ।।
जब इन्द्रिय पाँव पसारे ।
तब कोई सुने न हमारे ।।
कोई मिले, सखी के लाल भले ! ।।1।।
जब जर-जेवर हैं कर में ।
तब मित्र बने घर-घर में ।।
धन गया- न कोई पुकारे ।
सब भग जाते डर सारे ।।
कोई मिले, सखी के लाल भले ! ।।2।।
जब सत्ता पास रहेगी । 
तब हाँजी - हाँजी होगी ।।
जब चुनाव में जा हारे ।
कुत्ते नही आय पुकारे ।।
कोई मिले, सखी के लाल भले ! ।।3।।
जब तप का बल है भारी ।
तब झुण्ड पड़े नर-नारी ।।
तप भ्रष्ट भीख नहिं डारे ।
घुमते रहो मारे - मारे ।।
कोई मिले सखी के लाल भले !  ।।4।।
यह तुकड्याने कहलाया ।
सब प्रभूकी छायी माया ।।
जब सत्‌गुरु किरपा तारे ।
तब दुनियाँ चरण पखारे ।।
कोई मिले, सखी के लाल भले ! ।।5।।