सजनोss ! अब स्मरण तुम्हारा आता

      (तर्ज: विट्ठला सम चरण... )
सजनोss ! अब स्मरण तुम्हारा आता ।
बिगड़ गयी यह रीत नीत  की-
महाप्रलय     ही    भाँता  ! ।।टेक।।
वे दिन कैसे थे भारत के ।
सब ही रहते थे इकमत से।।
तुले सदा रहते थे सत्‌ के।
अब तो कहिं न दिखाता।।सजनों ! ।।1।।
श्रम करना सबकोही पसन्द था।
अतिथी आदर में आनंद था ।।
प्रभु-भक्तिका प्राय:छन्द था।
अब भगवान्‌ न कहता ।। सजनों ! ।।2।।
यह है भूल हमारी भारी।
बचपन शिक्षा दिया  अधूरी।।
प्यार किया सबही बेकारी।
धर्म-कर्म   नहीं    ममता ।। सजनों ! ।।3।।
बहती दुनिया संयम-नियम से।
तुकड्यादास कहे क्या इनसे।।
हँसी-मजाक उडाते  हमसे।
दिल अब कहने घबड़ाता।। सजनों ! ।।4।।