खोगयि आज देखो, न्याय - नीती लोग की
(तर्ज: रो रही आज देखो कौसल्या माई! . . )
खोगयि आज देखो, न्याय-नीती लोग की ।
घर-घरोंमें छाय गई लालसा ये भोगकी ।।टेक।।
छोटे-बडे बालकों में, शौक है सिनेमा का।
घडी-घडी डोज चले, चाय-बीडि-तमाकू का।।
कोई नहीं जाता बाबा ! साथ करने सन्तोंका।
जिधर-उधर बोलबाला, झूठ घूंसवालोंका।।
कैसा लगे पार बेडा, आज के जमानेका।
जहाँ-तहाँ मिलता उन्हें जीवनमें भारी धोखा।।
इसीसे ही छायी छटा, चेहरेपे रोग की ।
घर-घरोंमें छाय गई लालसा ये भोंगकी ! ।।1।।
लाज चली जारही है, सरे आम अबलाओंकी।
झूंड की झूंड चले, छेडने को गुण्डों की।।
कौन रोकता है उन्हें? - हाथ ना लगाये कोई ! ।
छाति ना किसी की ऊँची, रोक दे ये अन्यायी।।
हमारी -तुम्हारी कल में, वही गती है जाननेकी।
किया नहीं टलता किसको बात है सुनानेकी ।।
कैसी मिटेगी यह बातें भारत के शोक की ?
घर -घरोंमें छाय गई लालसा ये भोगकी ! ।।2।।
जूवाँ और शराबियोंने, मशालें जला दिया है।
कई बाल-बच्चोंको, हकसे रुका दिया है।।
कौन किसकी बात सुने -सभी को है गर्व भारी।
बिना कष्ट के हो सारे चाहते है, लड़्डू-पूरी।।
कहे दास तुकड्या, ऐसी नीती कहाँ हो प्यारी।
अरे सोचनेवालों ! तुम सोच लो बात मेरी।।
आज हुशियार बनो, वक्त है संजोग की।
घर-घरोरम छाई गई लालसा ये भोगकी! ।।3।।