गांधी का लगाया पौधा, जाता गर ऊँचा सीधा

        (तर्ज: विश्वास पे क्यों बैठा है? . .. )
गांधी का लगाया पौधा, जाता गर ऊँचा सीधा
यह स्वर्गहि होता भारत,
आती न उसे फिर बाधा ।।टेक।।
पर सब अपना स्वार्थ साधने बीच बने हैं रोडे ।
अपने व्यसनों के खातिर ही दौड रहे हें  घोडे ।।
ये मानव  नहि, दानव   हैं ।
बस रहनी ही अभिनव है ।।
सत्ताके लिए मर-मरते, नहि फल पाया है आधा ।।१।।
गांधीने बोला था, मन्त्री हल जोते   खेतीमें ।
सेवा करनेको दौडे बह मिलजुल कर जनता में ।।
वह स्वप्न नजर नहि आया ।
इनको    ममताने     खाया ।।
अब तो है बड़ी फजीती,नहि है घोड़ा ना गध्धा।।२।।
सत्याग्रह में जिन लोगोंने   प्राण   तलक   दे   डाले ।
उनके लड़के -बच्चे अबतक किसिने नही सम्हाले ।।
वाह वाह रे ! तुम्हारी नीति ।
बेमान  ने   बाजी     जीती ।।
तुकड्या कहे,हमने देखा,अब क्या बोलेंगे ज्यादा ?।।३।।