रंग गयी नजर मेरी आज, सुना आवाज- गुरुमहाराज, खुल गये ताले ।
तर्ज: आरती करो हरिहरकी....)
रंग गयी नजर मेरी आज, सुना आवाज-
गुरुमहाराज, खुल गये ताले ।
दी - नशा चढा बिन बोले ।।टेक।।
हृद्यासन आसन था डाला
प्रेम के अँसुवनसे धो डाला ।
भावभक्तिके फूल चढाये, बैठा ध्यान लगाले। दी-नशा0।।१।।
सोsहं का निजधूप जलाया ।
निर्मल ग्यानकी ज्योति जगाया।
पागलसा मैं देख रहा था, उनकी याद उजाले । दी-नशा0।।२।।
पहले मीठी बीन बजाई ।
फेर घनी बिजली चमकाई ।
चाँद सुरजबिन पडा उजाला, टूटी भेद-दिवाले । दी-नशा0।।३।।
डोल गया भूमण्डल सारा ।
उलट गयी अँखियनकी धारा ।
तुकड्यादास मगन हो बैठा, अपना अनुभव तोले । दी-नशा0 ।।४।।