वाहवा रे जादूगार कोई

           (तर्ज: यह प्रेम सदा भूरपूर रहे...)
वाहवा रे जादूगार कोई, जिसने जीवन में जादु भरी ।
हर किसम -किसम के ढंग रचे, झुरमट, बादल,बिजली बिखरी ।।टिक्र।।
बहते नदियों का नीर चला, ना हाथ मिले फिरसे पहला ।
बस एक चला, दूजाहि मिला,या सूख गया, कहि बाग खिला ।।१।।
नित बदल चला जाने न कहाँ, उसिके रैंगमें जाता हे बहा ।
है एक मगर बनता कितना, भ्रम - भेद नजर में रहत बना ।।२।।
कहि शेर भये या बादशहा,कहिं चोर हुएँ या शूर महा ।
चलतेहि रहे थकतेहि नही, तज केंचुलि नाग जो नूतनहि ।।३।।
यह भूल भरी जगके मन में,मरना बनना हमको रण में।
है ज्ञान जिसे वह सबसे परे, बनते है वही जो कर्म करे ।।४।।
हर हूस्नको छान लिया हमने,है एक,बनाये दो अमने ।
कहिं फूल फुले,कहिं पान ढले,कहिं मूल मिले,कहिं बीज खिले ।।५।।
हमही तो अकेले है और थे,अपने पहले,उसके पहले ।
पर भूल गये उसके घरको, अब याद नहीं, जगसे बहले ।।६।।
वह जादूगर है कौन भला,यह जान पड़े तब तो पकडे ।
तुकड्याकी बात न भूलो कभी, जगसे मत जाओ कभी जकडे ।।७।।