गिरिधर गोपाला लाल

      (तर्ज: किस देवताने आज मेरा...)
गिरिधर गोपाल लाल, आते  होंगे  क्या ? 
मीठि-मीठि बन्सि कही बजाते होंगे क्या ? ।।टेक।। 
सुन तो रहे कान मेरे, तान कही से अंदर ।
दिलकों भरे रँगमेंही, रंगाते    होंगे   क्या? ।।१।।
तार लगी नैननकी, देखने उन्हें  दिलभर ।
ना जाने नजरको मेरी, लजाते होंगे क्या ? ।।२।।
मै तो भुला हूँ मुझको , मस्त हुआ अंदरही ।
देख खुशी कोहि मेरी, टलाते    होंगे   क्या ।।३।।
आओ गोपि-गोप सभी,मिलके पुकरेंगे उन्हें ।
बीचमेंहि कोइ कहीं, रिझाते   होंगे   क्या? ।।४।। 
कहत तकड्या भारतके, भार उतारनेको अभी ।
रंगभरा कसके गरुड, सजाते होंगे  क्या ? ।।५।।