रंगभरीमारी , पिचकारी गिरिधारी
(तर्ज: हरहर बोलाना....)
रंगभरी मारी, पिचकारी गिरिधारी ।
चुनरि हमारी भिग गयी सारी ।।टेक।।
सब कोई लाल भये, कुंजनबनके बासी ।
गौ-गोपाल सभी बाहरके भी हौसी ।।
झूमत-डोलत है बन-लतिकाएँ सारी ।
वाहरे मुरारी ! क्या कहुँतारी ।।१।।
अंदर योगि रमे, साधु समाधी लागी ।
निर्भय वृत्ति भयी,माया सबकी भागी ।।
तुकड्यादास कहे,बलिहारी -बलिहारी ।
अचरज तेरी महिमा न्यारी ।।२।।