खोगयि आज सारी जिन्दगी हमारी

(तर्ज: रो रही आज देखो कौसल्या माई... )
खोगयि   आज   सारी   जिन्दगी   हमारी ।
सार ना मिला है  कोई, मिले   ना  मुरारी ! ।।टेक।।
बचपनोंसे नाम उसका, सुना था पुराणों में ।
मगर खेल - कूद थी, वो गया नहीं कानोंमें ।।
जगे रहे मौज करते, खाने - पिने   चैनों  में ।
धुंद थी वो बालकपनकी, चारों और नैनोंमें ।।
बीच - बीच रोक था ओ पढने  पढाने   का ।
कहीं -कहीं संगतीने खाहि लिया उसमें धोखा ।।
आदतोंने   बांध    डाली     हमारी     हशारी ।
सार ना मिला है  कोई, मिले   ना   मुरारी ! ।।१।।
जवानी की छायी घटा, आयी सारी अंग में ।
कौन पूँछे धर्म - कर्म, तिरीया   के   रंग   में ।।
वही है भगवान्‌ जानो, और ना दिखे कोई ।
मात-पिता का ही कहना, सुननेको कान नहीं ।।
जहाँ-वहाँ झगडा जूवाँ,शराबीकी धुन्द छायी ।
चोरि-जारी गुण्डेपनकी अंगमें है नसा   आयी ।।
पाप - पून कौन समझे? सुधबुध सभी   हारी ।
सार ना मिला है कोई, मिले   ना   मुरारी ! ।।२।।
बुढ़ापे की बख्त आयी, होश लगा  जानेको ।
सोचनेकि दृष्टि गयी, छोड अभिमान   को ।।
दिलमें लगे क्या-क्या करना जीवके उध्दारको ।
कैसा लगे जिया मेरा, प्रभू-भक्ति   प्यार   को ।।
थके   सारे   हाथ - पेर   बनेगी   न   साधना ।
गया - गया वख्त सारा, क्या करे आराधना ।।
तुकड्याने बोला, मेरी लाज रखना आखरी ।
सार ना मिला है कोई, मिले   ना   मुरारी ! ।।३।।