संतोमें एक संत, गजानन भी होगये।
(तर्ज: शिरडीमें साईनाथ बडे संत हो गये...)
संतोमें एक संत, गजानन भी होगये।
अलमस्त भक्ती पाके, निजधाम सोगये।।टेक ।।
लाखोंने उन्हें देखा था, बेहोश प्रभूमें।
पर्वा न उन्हींको थी, अच्छा ही रहूँ मैं ।।
जरतारी कई कपडे, गरीबोंको दे गये।। १।।
शेगाव धाम उनका, भक्तोंने बनाया।
जाती हजारों जनता, धूप दीप जलाया।।
उनकी गरीबी और दरिद्र दूर हो गये।।२ ॥
उनकी सहज समाधीका, भारी योग था।
बिन कपडे रंगे उनका, अलमस्त जोग था।।
किसको नही है दूर किया, जो भक्तीसे गये।। ३ ॥
ग्यानीमें जो ग्यानी थे , भोलेमें भोले-भाले।
जंगल हो या मंदर, दोनोंसे थे निराले।।
कौन पाये उनकी हस्ती,जनम जनम खोगये।। ४।।
हम ऐसेही वलियोंके, चरणोमें है दिये।
संत आडकोजीने, बचपनसे ले लिये।।
तुकड्या कहे इस संतसे, कई भक्त तर गये।। ५ ।।