गुरु-किरपा नहीं पडी सडकपर, मेरा में जानूं ! बीज न बोये जाते खडकपर, मेरा में जानू !

तर्ज : गुरु-कृपाका अंजन पाया...)

गुरु-किरपा नहीं पडी सडकपर, मेरा में जानूं !
बीज न बोये जाते खडकपर, मेरा में जानू ! ।। टेक।।
जबतक निर्मल चित्त न होता, गुरु-उपदेश नहीं फलता।
निर्मल चित्त होनेको चाहिये, शुध्द-चरित्र औ भाऊकता।
भाऊकताको श्रवण - भक्तिका, संच चाहिये, कानोंमें।।
श्रवण -भक्तिमें तारतम्य हो,चूक न सके मत वाणींमे।
स्थिर ना रहता दिल धडकनपर, मेरा में जानू !
बीज न बोये जाते खडकपर, मेरा में जानूं !  ।।१।।
जहाँ -वहाँ गुरु- किरपा चाहिये, बात बातमें जन गावे।
मगर क्या धन-दौलत देनेसे, गुरु-किरपा घरमें आवे? ?
बडी हैं उसकी कीमत बाबा ! बजारमें नहिं मिल पावे।
जनम-जनमकी पुंजी लगती, सत्‌-सगत तब मिले जावे।।
नहीं मिलती वह क्रोध भडककर, मेरा में जानू!
बीज न बोये जाते खडकपर, मेरा में जानूं ! ।।२।।
हाथ जोड़ और पेर पडनेसे, मिले वो सस्ता काम नही।
उसको चाहिये आज्ञा-पालन,उसके बिन आराम नहीं।। 
जिधर-उधर उसकाही चिंतन, गुरुकी आज्ञापालन हो। प्राण जाये पर बचन न जाये, दम-दममें संचालन हो ।। अटल हो निष्ठा सबसे बढकर, मेरा मैं जानूं !
बीज न बोये जाते खडकपर, मेरा में जानूं ! ! 0 ।।३।।
सच्चा काम करनेसे जैसा, इनाम साहब देता है।
भाव -भक्तिसे भजन करो तो, ईश्वर वैसे मिलता है। ।
उससे बढकर है गुरु-किरपा, सबमें ईश्वर पटता है।
मैं और तू का भेद जहाँपर, ज्ञान रूपसे मिटता है।।
तुकड्यादास बोले, प्रेम तडपकर, मेरा में जानूं ।
बीज न बोये जाते खडकपर,मेरा में जानूं ! ! 0 ।।४।।