देखो कलजुग के ग्यानी, एकसे एक पड़े मानी
भजन ३०
(तर्ज : जमका अजब तडाका बे... )
देखो कलजुग के ग्यानी, एकसे एक पड़े मानी ।।टेक।।
अपना सबको मार्ग बताकर, उसकी कर हानी।
धनदौलत सब लूट दबाई, यह रखते बानी ।।१।।
करे शिष्य कंगाल फेर तो, बातन से तानी ।
सिखना हो तो सीख कहे बे, नहिं तो दूर जानी ।।२।।
शिष्य बिचारा घर-घर ढुंढे, नहिं पूछे रानी ।
लाथ मारकर भाई निकाले, नहिं देखे सानी ।।३।।
कहता तुकड्या चोर-बजारा, उसे जगत मानी ।
बिरला बंदा ऐसा निकले, आपहि को जानी ।।४।।