विश्वव्यापक प्रेम करना ही हमारा धर्म है
(तर्ज: हर जगह की रोशनी... )
विश्वव्यापक प्रेम करना ही हमारा धर्म है।
सबसे मिलजुलके बिचरना ही हमारा कर्म हैं ।।टेक॥
कूपमंडूक वृत्ति लेकर, ना कोई ऊँचा बना।
सबके सुखदुःखको समझनाही,हमारा वर्म है।।1।।
भेद अपना औ पराया, स्वार्थपर होता खडा।
स्वार्थ की दीवारपर अडना यह भारी शर्म हैं।।2।।
प्रेमकी सक्रियतामें, जाति-पंथ न देश भी।
अखिल मानव एक है, सत् ग्यानका यह मर्म है।।3।।
तोड़कर दूईका परदा, प्रेमसागर में हम रंगे।
कहत तुकड्या यहही मानवका, उचित सत्कर्म है।।4।।