गुरुनाथ कहे सुन साधकजी ! निज ग्यान न हो चित्त-नाश बिना

भजन ४४
(तर्ज : नारायण जिनके हिरदमें....)

गुरुनाथ कहे सुन साधकजी ! निज ग्यान न हो चित्त-नाश बिना ।।टेक।।
नेमहि दान हजार किये, तोभि पावत नाही गुरु न किना।।१।।
जब ज्ञानी गुरु उपदेश करें, तब सार प्रपंच में होत जीना।।२।।
नहि प्रेम रखे जग-जातनमें, कोइ लाख रुपै, दिल ज्यान दिना।।३।।
सब तुच्छ दिखे, जन ये, तन ये,फिर जन्म-मरणकी न आस किना ।।४।।
मनहार लिने दिलदार इन्हे, जहँ याद किने सुरपान पिना।।५।।
बिन राम सुना कोई स्थानहु ना, कहीं पापहिना पुन कामहिना ।।६।।
कहता तुकड्या नहिं द्वैत बना, गुरु साथ लियो फिर कौन भिना ?।।७।।