संसारकी आँधी में, बह जानेका डर है
(तर्ज : अब जाग उठो भाई...)
संसारकी आँधी में, बह जानेका डर है ।।टेक।।
विषयोंकी हवा छूटी, अँखियोंमें पडी धूली ।
मम़ताकी उडी काँटी, सब बदन चुभी खुली ।।
इस क्रोधकी बिजलीसे, जल जानेका डर है ।।१।।
इस अहंकार ने मन पागलसा बना डाला ।
ना समझ रही थोडी, दे दिया अजब प्याला ।।
ना राह मिली सीधी, ढल जाने का डर है ।।२।।
गुरुदेव के चरणों में यहि अर्ज हमारी है ।
भूले ना हम तुमको, हम दरपे भिखारी है ।।
तुकड्या कहे बिन प्रभूके, मर जानेका डर है ।।३।।