सत्संगति के निर्मल जलसे, न्हाये हम दिल खोल पियारे

(तर्ज: वैष्णव जन तो तेने कहिये...)

सत्संगति के निर्मल जलसे, न्हाये हम दिल खोल पियारे !
मैल रह्यो नहीं अन्दर-बाहर, भेदके पडदे कट गये सारे ।। टेक ।।
जहाँ देखा वहाँ प्रेम निरन्तर, आतम-झलक खलक भर मारे ।
कहीं दूजो नहीं जीवन जगमें, प्रेम न जावत जाय सम्हारे  ।। 1।।
अनहद की धुन बजत अखण्डित, मधुर मधुर सुर गान पुकारे।
मुझमें विश्व, विश्व में मै हूँ, तुकड्या कहे लगी नाव किनारे ।। 2।।