रणमें शूर नहीं घबराता। और - और सरसाता
(तर्ज: रघुबीर आज रहो मेरे प्यारे...)
रणमें शूर नहीं घबराता। और - और सरसाता ।।टेक।।
जातपात और धर्म - पक्षका, नहीं उसे कुछ नाता।
जो शत्रू देशको बिगाडे, बस ! उसपर चढ़ जाता ।।1।।
जिसके करनेसे दुनियाको, बडा कष्ट पड़ जाता।
अशांतता फैले जनतामें, उसको नहिं सह पाता ।।2।।
जनम -मरण यह खेल समझकर,जरा न धोखा खाता ।
जैसे सिंह चढ़े हाथीपर, वेसे रण गर्जाता ।।3।।बादलसम गडगडाट अपनी , चारों और सुनाता ।
तुकड्यादास कहे ऐसेको, प्रभू अपना कर लेता ।।4।।