खो दिया मैने उमर सब, ना सुनी कुछ संतकी

(तर्ज : मानले कहना हमारा...)
खो दिया मैने उमर सब, ना सुनी कुछ संतकी ।।टेक।।
बहुत संतोने सुनाया, खयाल मैंने ना गुनाया ।
मित्र के संगमें धुनाया,   आइ    बखती    अंतकी ।। १ ।।
बालपन सब खोदिया था, याद प्रभुकी ना किया था।
ज्वानीमें मस्ती लिया था, हल रही   धनु    दंतकी ।। २ ।।
रातदिन विषयों में भूला,सुतमितोंको देख झूला ।
दुर्जनों के संग   डूला,    ना   सुनी   गुणवंत   की ।। ३ ।।
अंतही जब आगया, तब पापसे पछता गया ।
कहत तुकड्या खागया जम,पागया गति जंतकी ।। ४ ।।