खोल नैनोंकी नैना, कहाँ पायेगी ?

(तर्ज : मेरी सूरत गगन में जाय रही ...)
खोल नैनोंकी नैना, कहाँ पायेगी ?
कहाँ पायेगी, मुझमें आ जायेगी ? ।।टेक।।
ब्रम्ह सनातन वही रूप कहते,
मेरे बिना सुन कहाँ जायेगी ? ।।१।।
अमर नगरमें बास उसीका,
जगतपर छा जायेगी ।।२।।
उसी नयन में जगत भरा सब
अंतरबाह्य प्रभा लायेगी ।।३।।
यह दास तुकड्या दो कर जोरत,
दासपना को वही खायेगी ।।४।।