घटका पट खोलो, फेर सुधी लीजिए
(तर्ज : निरंजलमाला घटमों... )
घटका पट खोलो, फेर सुधी लीजिए ।।टेक।।
मैलनसे सब भरा जीवाजी, मैल सफा कीजिए ।
सद्गुरूके गुण गाकर बंदे ! नामधुनी रीझिए ।।१।।
भजन उसीको कहते भाई ! अमृतको पीजिए ।
जीवनकला एक धारा निकली, जा उसमें भीजिए ।।२।।
टाल मृदंगा बाजत बाजा, नामका सुख बूझिए ।
दश नादोंका बाजत डंका, कर्णनसे पीजिए ।।३।।
सुन्न महल एक दीप लगाया, दंगरंग दीजिए ।
कहता तुकड्या द्वैतभाव हर, अपनेमें रीझिए ।।४।।