श्रीगुरुको भज, छोड मगरूरी

( तर्ज : दर्शन बिन जियरा तरसे रे !... )
श्रीगुरुको भज, छोड मगरूरी ।।टेक।।
न खावे जूता । क्यों सोया है ? मैल न धोता।
लटकत जावे जमघर रोता, नामकी है यह देख जरूरी ।।१।।
क्यों मरता है इस गटकनमें ? सोच दिवाने ! अपनी तनमें ।
सद्गुरूको भज मनके मनमें, कोई न तेरी जान   कसूरी ।।२।।
लीन भाव धर दूर जाना है, आपहिमें निजरूप ध्याना है।
नरतन सबका सुखठाना है, देरी न है अब देख   हजूरी ।।३।।
कहता तुकड्या गुरुका प्यारा । आडकुजीने दे मुझे थारा।
जन्म-मरणका दुःख सब हारा, येहि करार कराय बहुरी ।।४।।