विद्या ही परम धन है नरका, संग्रह है जीवनभरका

(तर्ज : जा जारे अपने मंदरमा .... ) 

विद्या ही परम धन है नरका, संग्रह है जीवनभरका ।। टेक ।।
धन -सत्ता-तन धोखा खावे, विद्या साधन इह-पर का।। 1।।
सब सुंदर में सुन्दर विद्या, काम नहीं उसको डर का।। 2 ॥
जन्म अनेक बीते बदला कर, विद्या नहीं भूले सरका।। 3 ।।
जहाँ जावे, मानही पावेगा, प्रेम करे  परके  घर  का ।। 4 ।।
विद्या - हीन पशु कहलावे, पात्र नहीं वह आदर का॥ 5॥
तुकड्यादास कहे, सद्गुण हो,सफल रहे भव -सागर का।। 6।।