गुरु नाम वहि श्याम, सब संत बोले ।
(तर्ज : इस तन धन की कौन बढाई....)
गुरु नाम वहि श्याम, सब संत बोले ।
वहि राम निजधाम, उसमेंहि डोले ।।टेक।।
जप माल दूर काल, दिल नित्य धोले ।
पुन-पाप हर ताप, निजनाम तोले ।।१।।
सब छोड़ गुण जोड़, अविनाश बोले ।
सुख टार दुख मार, सब जान फोले ।।२।।
कर संग हर नंग, चढ़ जाय मोले ।
निजरंग बन दंग, उसमेंहि सो ले ।।३।।
कहि मान हर तान उसमें भिगो ले ।
तुकड्या कहे जान वनरान भोले ।।४।।