ख्याल कर जरा, अपनी कायामों

(तर्ज- गुरुकों देखा अपने... )
ख्याल कर जरा, अपनी कायामों । दौड़ता क्यों बे मायामों ? ।।टेक।।
उलट कर देखो, श्रीगुरुको प्यारे ! देखते कामक्रोध हारे ।।
रूप क्या बना ! बिन बिजली - तारे । अजब रंग चमके चमकारे ।।
कहूँ क्या बाते, चित्त सोहम्‌ धारे । सभी घटघटमें रमता रे ।।
खोल ले नैन, अजब है चैन, मत फिर काननमों ।। दौडता० ।।१।।
अनाहत बाजा, बाज रहा न्यारा । त्रिवेणी संगमकी धारा ।।
रातदिन बरसे, जमको नहि थारा । भ्रमर-गुंफामें दिल मारा ।।
सुषुप्ती - तुर्था - उन्मनिके पारा । आपमें आप समा हारा ।।
मौन नैनोंसे, डुले नहि जैसे, शून्यकी शय्यामों ।। दौडता० ।।२।।
कल्पनातीत, बना रूप जिसका । वहाँ तो जमको धर ठोका ।।
पकड़कर करमें, जो देखे धुनका । करे सब बजार आपहिका ।।
द्वैतभावना टूटा पाश उसका । पाप और पुण्यका न थाका ।।
सदा अलमस्त, उदय ना अस्त, सृष्टि सभी तनमों ।। दौडता ० ।।३।।
शून्यके पारा, नैननको हारा । तोडके जन्ममरण - फेरा ।।
बने अविनाशी, पी. अमृत-धारा । लक्ष्यका नही रहा डोरा ।।
अछक्षी बना, आडकुजी मेरा । दास तुकड्याको दे थारा ।।
न छोडू चरण,कभी मनहरण, ध्यान धरूँ  हियामों ।। दौडता० ।।४।।