संत मिले बडभागा साधो !

(तर्ज : अपने आतम के चिन्तन में...)
संत मिले बडभागा साधो ! संत मिले बड भागा रे ! ।।टेक।।
जो संतनको सीस नमावे, सोहीको तन जागा रे ! ।
जन्म-मरण के बंधन टूटे, आतम - ज्योती लागा  रे ।।१।।
वही मारग-दर्शक ईश्वरके, देख चढे बैरागा रे! ।
जो निर्मल मनसे पद साधे, छूटे जमका    धागा   रे ।।२।।
आपही आप लखे अपनेको, जगसे हो अनुरागा रे ! ।
नहीं कछु चाहे ग्यानपनाको, नहीं चाहे कछु रागा रे ।।३।।
वह तो प्रेमनके संग दौरे, हरदम रहत निसंगा रे ! ।
नहीं माँगे कछु धन-संपतको, माँगे भाव - सुहागा रे ।।४।।
दर्शन होत कटे अँधियारा, पावे अंत-रंगा रे!।
तुकड्यादास वही पद चाहे, संतनके सँग लागा  रे ।।५।।