संन्तोंकी बानी हमसे कही ना जाय

(तर्ज : निरंजन पदको साधु कोई पाता है ....)
संन्तोंकी बानी हमसे कही ना जाय ।।टेक।।
सत्संगत में एक अचंभा, हमको दिखने आय ।
जीतेपनमें मरे समाना, आदम   को   कर   लाय ।।१।।
एक तमाशा हमने देखा, मूरदा गाना गाय ।
जल अंदर में धूना सिलगे, थूटा    तार    बजाय ।।२।।
एक दिन ऐसा भजन लगा कि, चींटी नाचन जाय ।
घरकी मर्जी बदल गयी तो, घर आदमको खाय ।।३।।
बोले - चाले हाँसे-डोले, ऐसा एक सराय ।
उसमें तैर रहे पाषाना,    तुकड्यादास    उठाय ।।४।।