गंगे ए ए ! तव चरण शरण मैं आऊँ
( तर्ज : विठ्ठल सम चरण...)
गंगे ए ए !
तव चरण शरण मैं आऊँ।
कई जन्मों का कूड़ा -कचरा ।।
धोकर साफ कराऊँ।।टेक ।।
कितने तारे तारनहारे।
पापी हो तो और उध्दारे ।।
भूली भटकी पडी अस्थियाँ ।
आखिर मैं भी समाऊँ ।। 1 ।।
कितने जन को जीवन देती ।
कितने साधू-सन्त बसाती।।
तेरे दर्शन से ही प्रीति।
अपने मन में लाऊँ ।।2 ।।
पर्वत फाडे कडकड तोडे।
भागीरथ के कसको जोडे।।
हरि का द्वार सताकर छोडे।
कैसे यह बिसराऊँ ।। 3।।
गुरुकुंज में कुण्ड बनाया।
सर्वतीर्थ यह नाम धराया। ।
उसिमें भी तू शामिल हैं ही।
बैठ - बैठ गुण गाऊँ ! ।।4 ।।
तृकड्या कहे, तेरे द्वार हजारो ।
कई भक्तों को दियो किनारो। ।
मुझ-से सेवक को भी तारो |
करीके अडी सुनाऊँ ! ।।5 ।।