शरणागत निर्विकार !

(तर्ज : प्रथम सुमर श्री गणेश...)
शरणागत निर्विकार ! भव- भय यह दूर वार ।
जन्म - मरण - पाश हार, नंदके दुलारे ! ।।टेक।।
मोरमुकुट सीस जड़ा, कुंडल निज कान लड़ा ।
जमुना - तट होत खड़ा, भक्तके पियारे ! ।।१।।
पीतांबर कसत कटी, मुरली धर अधर छटी ।
वृंदावन कुंज - वटी, सुंदर गीत  गा   रे ! ।।२।।
कमलनयन  नट-स्वरुप,  राजनके राजभूप ।
तुकड्या वर दे अमूप, नामको जिया रे ! ।।३।।