संतो ! आतम - धूनि जलाना
(तर्ज : मोसम कौनन कुटिल खल कामी... )
संतो ! आतम - धूनि जलाना, काहेको माँगत दाना ? ।।टेक।।
नहिं माँगे मोती मिल जावे, माँगे भीख न पाना ।।
करम-धरमकों कबह न छोडो, पावे पद निर्बाना ।।१।।
काहे तनपर खाक रमावे, आशा-भस्म लगाना ।
विवेक -चिमटा करमें लेकर, अंतर अलख जगाना ।।२।।
दया -प्रेमकी तुंबडी लेकर, ईश्वरके गुण गाना ।
काम -क्रोधकी लकडी करमें, दुर्गुण पार हटाना ।।३।।
सहजस्वरूप मगन हो बैठे, जो चाहे मनमाना ।
तुकड्यादास कहे सब पावे, काहे भटकत जाना ।।४।।
(--- पंढरपुर)