संतो ! बिकट रहन - निर्धारा

(तर्ज : अवध अगम अगोचर ऐसा... )
संतो ! बिकट रहन - निर्धारा ।।टेक।।
दुनिया तजकर जंगल बैठे, अंग बारि-तप-धारा ।
दुनियाका तो संग न छूटा, पाप बढावत    भारा ।।१।।
खाना पीना सुखसे सोना, ऐसी उमर गुजारा ।
ग्यान ध्यान कबहू नहिं साधे, हँसते रैन बिसारा ।।२।।
जब तक अंग न आय उदासी, तब सब ढोंग-धतूरा ।
बिरला कोऊ जंगल पावे, भोगत  कष्ट   अपारा ।।३।।
नहिं आशा रहने बहनेकी, अंतर-तार पियारा ।
तुकड्यादास कहे वह पावे, आतम-ज्योत-उजारा ।।४।।