संतो ! संतनकी गत न्यारी
(तर्ज : अवध अगम अगोचर ऐसा... )
संतो ! संतनकी गत न्यारी ।।टेक।।
नहिं कछू माँगे भीख-भिखौवा, नहीं आप -हितकारी ।
वे तो साधनसे है न्यारे, टूटी मैं - तू सारी ।।१।।
नहिं चाहे कछू पाप-पुण्यको, रूचिर भोग परिवारी ।
वे आतमसे लाग पड़े है, हारी देख बिगारी ।।२।।
नहिं चाहे कछु सुखकी आशा, नहि माँगे दुख भारी ।
नहि बांधे कछू जन्म-मरणसे, सबसे प्रीत पियारी ।।३।।
दीन नहीं अरु रैन नहीं जहँ, नहिं बादल -अंधारी ।
नहीं उजारा पर-परकासा, आपहि खेल- खिलारी ।।४।।
नहिं कछु स्वर्ग मृत्यु पाताला, तीनहु देह निवारी ।
वे तो सबके परे बसे है, निरक्षरहि निर्धारी ।।५।।
आपहि आप समाया निजमें, लगी ब्रह्मकी तारी ।
होकर साक्षी सब इंद्रियका, देखे मौज पियारी ।।६।।
नहिं भूले रिध्दी-सिध्दीसे, सीधो जात उजारी ।
परा-परे पर लेटत जाकर, जाप-अजापा हारी ।।७।।
तुकड्यादास कहे बिन संगत, नहिं पावे पद भारी ।
बिरलाही जा पहुँचे उसमें, जो कोई अर्थ बिचारी ।।८।।