गुरुराज दयाल ! दया करके

(तर्ज : अल्लाह का परदा बन्दहि था...)
गुरुराज दयाल ! दया करके, मोहे भवसागरसे पार करो ।।टेक।।
नाम तुम्हारा पावन है, इन तीनों लोक - सराइनमें ।
पाप कटाकर दीननका, यह नौका पार उतार करो ।।१।।
भूला हूँ जगबीच खड़ा, कोइ आस-मिटावन देख रहा ।
आप बिना दुसरा न दिखे, जग तारक ! दास-उध्दार करो ।।२।।
लख चौरासी भूल पड़ा, बिरला मानुज-तन पाया हूँ ।
फिरसे न मिले यह बक्त गया, अब जन्म-मरनसे हार करो ।।३।।
आस तेरी धरके यहाँपे, दिनिदास भिखारी आया हूँ ।
यह तुकड्यादास भुला सुधरो, बरदानसे मन मार करो ।।४।।