चल ऊठ गडी ! यह वक्त बडी
(तर्ज : अल्लाह का परदा बन्दहि था... )
चल ऊठ गडी ! यह वक्त बडी, फिरसे न मिले मनमाना है ।
दे ख्याल उधर यह है सरवर, चुन-चुनके मोती खाना है ।।टेक।।
चलि लोभ-लहर भलि काम-बहर, ये मदमत्सर हटवाना है ।
अँधियारेसे दुर जाकरके, उजियार-बिछाना पाना है ।।१।।
उनके बिचमें जलखम्बरुपी विषयन-चिडियाँ उडवाना है ।
दुविधारूप एक मगर बाका, उसको दुरसे हटवाना है ।।२।।
उसमाँहि भले खुब फूल फुले, सुविचार-विवेक उठाना है ।
कुविचाररुपी इक वृक्ष बड़ा, उसको सबसे तुड़वाना है ।।३।।
इस निर्मलमें इक भास भरा, वह मायारुप दर्शाना है ।
तुकड्याकी माया डोल रही, तन मायामें मिलवाना है ।।४।।
जो बाकि बचा वह राम सचा, निर्मल जलसे धुलवाना है ।
खुद रामहिमें वह राम भरो, फिर रामहि राम जमाना है ।।५।।