चल छोड़ मकान निकल बाहर

(तर्ज : अल्लाह का परदा बन्दहि था... )
चल छोड़ मकान निकल बाहर, झूठे जगमें रहनेबाले ! ।।टेक।।
नहिं घरका नामनिशाना था, तब कहाँपर तेरा ठाना था ? ।
सोहबत में झूठ जमानेकी, दिनरैन खुशी कहनेवाले ! ।।१।।
कहाँपर है दोस-जिगर तेरे, जो तुझको भूल गिराते थे ।
सब छोड़ चला बनमें प्यारे ! आदमकी  बहलानेवाले ! ।।२।।
अबतकके मोहबत पानेमें, क्या शुरमा काम किया कोई ? ।
सबदिन दुखी विषयोंमे गडा, आखिरमें तज जानेवाले! ।।३।।
जो लेना है सँग लेकर चल, यह फौज खडी आयी भीतर ।
जो बतलाना बतला देना,  सब मेरा  यह   कहनेवाले  ! ।।४।।
पहलेही घर गर पाता था, फिर क्या चोरोंसे नाता था ।
अपनेसे भूल करी प्यारे !    जिगरीको    दिखलानेवाले ।।५।।
हमको तो खूब उपदेश दिया, जानेको दुसरे घरभीतर ।
दिखता है कौन किसीके है, जो है   वहाँपर    जानेवाले ।।६।।
मानुजतन दुर्लभ पाया था, क्यों हीरा वक्त गमाय दिया ।
अबतो भी छोड सभी आशा, लब्जोंसे बतलानेवाले ! ।।७।।
अब आखिर का एक मकाना धर, जिसको न कभी भी फिरके डर ।
कहे तुकड्या याद रखो हरकी, आबाद मजा पानेवाले ! ।।८।।