गुरु ! तुमहि तो हो, गुरु ! तुमहि तो हो
(तर्ज : तेरी कलबल है न्यारी....)
गुरु ! तुमहि तो हो, गुरु ! तुमहि तो हो, गुरु ! तुमहि तो हो भवपार करन ।।टेक।।
और सभी स्वारथके साथी, कोड न मोरत जन्म-मरण ।।१।।
धन सुत दार सभी चलतीके, भेजत मुझको पाप-भरन ।।२।।
कर्म - नदी घनघोर बहत है, सतसंगत बिन कौन तरण ।।३।।
तुकड्यादास कहे बिन किरपा, धुनक जले जहँ देहसरण ।।४।।