शंकर ! तोरी लहर, हमारे मन भाई है
(तर्ज : तज दियो प्राण, काया कैसी रोई.... )
शंकर ! तोरी लहर, हमारे मन भाई है ।।टेक।।
अंग बभूती गाँड लँगोटी, सिरपर जटा रमाई ।
बास सदा कैलास - शिखरपर ।
भंग के पियेसे डोले, रामध्यान छाई है ।।१।।
मुण्डनकी माला गलमाँही, साथ भूत शैतान सवाई ।
सिरपर गंगाकी ठंडाई ।
नागके रहेसे शोभे, धतूरा चबाई है ।।२।।
नंदी बैल रहे सँगमाँही, डमरू त्रिशुल हाथ धराई ।
मस्तकमें चंद्र-ज्योत शोभे ।
तीनहू नैनोंकी ज्वाला कामपे चलाई है ।।३।।
विषय -संगके त्यागी स्वामी ! भक्तनको वरदायी ।
तुकड्यादास कहे कर करूणा ।
दीन मैं तुम्हारी ऐसी, लहरमें लगाई है ।।४।।