गयी मोरि लाज नाथ ! आयके बचाईये

(तर्ज : तज दियो प्राण, काया कैसी रोई... )
गयी मोरि लाज नाथ ! आयके बचाईये ।।टेक।।
तनको बल सब हार पडो है, नहिं धनकी कुछ आस रही ।
सब दुनियासे हार पडा हूँ ।
भूलको सुधारकरके    पासमें  बिठाईये ।।१।।
देवल मसजिद घूम फिरा अब, खेलनमें कुछ मौज नहीं ।
बालकसे बूढ़ेतक देखा ।
स्वारथोंके साथी सभी, बिना राम पाईये ।।२।।
आखिर एक तूहि तू मेरा, औरनके सँग रीत नहीं ।
तुकड्यादास कहे जाने दे ।
गयी को कटाय करके, रही को निभाईये ।।३।।