सत्संग कर निहारो, क्या रुप है हुजुरका
(तर्ज : तेरे दिदार के लिये बंदा हैरान है...)
सत्संग कर निहारो, क्या रुप है हुजुरका ।।टेक।।
छाई घटा बादलकी, जैसा नबी समाया ।
मामूर समाया जो, क्या रूप है हजुरका ।।१।।
पीछे नजर उठाओ, नैनोंकी नैन देखो ।
हर नैनमें भरा वह, क्या रूप है हुजुरका ।।२।।
तारे कभी चमकते, बिजली कभी दमकती ।
सूरज कभी निहरता, क्या रूप है हुजुरका ।।३।।
कभी तो न कुछ नजर है, सूना पड़ा उजर है ।
अलमस्त डोलता हो, क्या रूप है हुजुरका ।।४।।
तुकड्या कहे निहारो, पल-पलकी संधियोंमें ।
हाजर नजर समाया, क्या रूप है हुजुरका ।।५।।
(-- सालबर्डी यज्ञ)