गोविंदा ! मै तो तोरे गुण गावत नाही

(तर्ज : मिलादो सखी ! श्यामसुंदर... )
गोविंदा ! मै तो तोरे गुण गावत नाही ।।टेक।।
छाय रही मोरे नयन अँधारी,      देखत    हूँ     उजराई ।।१।।
भौंरत हूँ दिनरैन बिहरमें, शांति  नजर     नहिं     आई ।।२।।
त्रिविध ताप मोहे रोकत पलपल, फिर फिर धुंद मचाई ।।३।।
दीन - दयाघन तू जगपालक, कैसि कदर   नहिं   आई ।।४।।
तुकड्यादास उदास भयो अब, मत कर भाव -  जुदाई ।।५।।