गुरु - दर्शनकी भूखी । अँखियाँ

(तर्ज : मिलादो सखी ! श्यापसुंदर...)
गुरु - दर्शनकी भूखी । अँखियाँ  ।।टेक।।
तड़प रहे ये नैन  हमारे,    लहर   कहाँपर    झूकी ? ।।१।।
नहि माने मन-भँवर फिरत है, राह कहाँपर  चुकी ?  ।।२।।
तुकड्यादास कहे दर्शन दो, नहिं तो बखत गइ हूकी ।।३।।