खोला पट आशिकका जाकर
खोला पट आशिकका जाकर, जब देखा तब हुशार देखा ।
न माल धनकी फिक्र जिन्हें है, अधारसे बे -अधार देखा ।।टेक।।
लगे हुए है सनमसे अपने, है राजरोशन बहार देखा ।
कभी न गर्मी कभी न सर्दी, धुनमें धुन ठण्डेगार देखा ।।१।।
वजह -वजूका न ख्याल जिनको, लगा हुआ एकितार देखा ।
हजारो लहरे जबाँसे निकले, लहरमें देखा तो सार देखा ।।२।।
न काम देखा न क्रोध देखा, जब देखा तबहि बोध देखा ।
लगे हुए है उस यारसेही, भीतर-बाहरमें शोध देखा ।।३।।
न चाँद सूरजकी रोशनी है, अलख-पलखमें उजार देखा ।
लगी है झडीयाँ सबर शुकरकी, बिहारकाभी झुंजार देखा ।।४।।
वह दास तुकड्याने एक देखा, न देखनेमें अनेक देखा ।
यहाँ-वहाँपर तिहूं जगहमें, वह आशिकोंकाहि लेख देखा ।।५।।
(-- वरखेड़)