गुरु ! अब छोड कहाँ जाऊँ
(तर्ज: जावो जावो ये मेरे साधू... )
गुरु ! अब छोड कहाँ जाऊँ, तुमबिन रहने नहि पाऊँ ।।टेक।।
तुमही माता, तुमही पीता, तुमरे पग आऊँ ।
भौर चित्त जो भटका मेरा, चरणोंमें लाऊँ ।।१।।
घर घर तोरो नाम पुकारत, टुकडा मँग खाऊँ ।
सोवत, जागत, चालत, बोलत, तेरो रूप ध्याऊँ ।।२।।
तेरि भजनमें डुल रहनेको, अंदर रँँग जाऊँ ।
सब देहनमें तूही भरकर, तेरो सुख चाहूँ ।।३।।
कहता तुकड्या श्रीसतगुरुको ! दूजा नहि भावूं ।
तेरो नाम जपूँ दिन रैना, जीवनमें जीऊँ ।।४।।