गुरुबिन बिरथाहि जनम गमाया ।
(तर्ज: मेरो प्रभू झूला झुले घरमाँही... )
गुरुबिन बिरथाहि जनम गमाया ।
नर ! काहे मानुजकी देह कमाया ? ।।टेक।।
पाप कपट छल माथे लगाये, कभु लीन वृत्ति न पाया ।
नारी नरोंका संग कराकर, विषयोंमेही भूल खाया ।।१।।
खालीहि आवे औ खालीहि जावे, जमघर मार उठाया ।
कछू नहि कीन्हा जो करना था, ख़ाली विषय भरमाया ।।२।।
ग्यानका मारग जाना न तनमें, षडरिपु साथी कराया ।
कहे दास तुकड्या, मनुजका उध्दारा, बिन गुरु होत न पाया ।।३।।