चल खोल मुसाफिर ! आँख जरा

(तर्ज: आनंद मनाओ हरदममें. ... )
चल खोल मुसाफिर ! आँख जरा । है देख हिरा अपने तनमें ।।टेक।।
कहिं ऊँचे से ऊँचे स्थान पडे, कोई खोजत नाहि इसी क्षणमें ।
सब भूल पडे इस मोहनिमें, इस  झूठे    मायाके   धनमें ।।१।।
इस तनमें नो खिडकियाँ लगी, है दसवाँ द्वार ऊँचा उनमें ।
वहाँ निर्गुणराजा राज करे, होकर निर्गुण  आया   गुणमें ।।२।।
एक भ्रमरगुफा कहलाई है, जहाँ बहती धार त्रिवेणी की ।
वहाँ ध्यान धरे योगी मुनिजन, अलमस्त रहा करते उनमें ।।३।।
कहे तुकड्या, नाद अनाहदसे, चढता है नशा भरपूर सदा ।
अजपाकी सुंदर तारहिसे, लगती है समाधी  क्षणक्षणमें ।।४।।