घरघरमें पालो गेैया, सुनलो मेरी पुकार
(तर्ज : गैयाके पालनवाले ! तुमको...)
घरघरमें पालो गेैया, सुनलो मेरी पुकार ।
भारतके बीर जवानों ! सुनलो मेरी पुकार ।।टेक।।
गैया है भारत-माता, जिससे बैल नजरमें आता ।
बैलोंसे खाना पाता, करलो दिलमें बिचार ।।१।।
गैयाको खिलाया खाना, वह रखे तुम्हारा बाना ।
बूढाभी दिखे जवाना, पिये जो दूधकी धार ।।२।।
लड़का जब दूध पीजावे, भारतका खून बढावे ।
भारत जैसा चमकावे, कर दे कुलका उध्दार ।।३।।
गैया दरवाजे आवे, तुमसे जब वह कुछ खावे ।
तब तुमको दुआ करावे, संकट पावेंगे हार ।।४।।
जो गैया बेचे भाई ! जब उसपर छुरी चलाई ।
तब तुमको पाप लगाई, भोगोगे जमके द्वार ।।५।।
गैया सब सुखि हो जावे, तब प्रभु दुआ भर देवे ।
कहे तुकड्या सुने सुनावे, उसका होगा उध्दार ।।६।।