गजब हुआ हरिकी मायाका
भजन १२१३
(तर्ज: तुमबिन मोरी कौने खबर ले...)
गजब हुआ हरिकी मायाका, हम नहि पार पवाते ।।टेक।।
नाहक बाते सुनाकर अपना, मुँह नहि अंत छिपाते ।
सच कहते, सचही बतलाते, हम नहि पार पवाते ।।१।।
जो कोइ हो उस हरिके प्यारे, सो चाहे तर जाते ।
सुनते है सुनवाते है पर, हम नहि पार पवाते ? ।।२।।
भव -सागरकी भौर कठन है, जिसमें काम सताते ।
समझाते समझाही करते, हम नहि पार पवाते ।।३।।
आसा अरु मनसाके माँही, पल - पल गोते खाते ।
तुकड्यादास कहे प्रभुके बिन, हम नहि पार पंवाते ।।४।।