गिरिधर काहे न बोले ?
(तर्ज : अब दिन बीतत नाहीं...)
गिरिधर काहे न बोले ?।।टेक।।
हम पापिनकों देखत नाहीं, करके मुँह छुपाले ।।१।।
सुंदर मनमोहनकी अँखियों, टक लागी दिल डोलें ।।२।।
अधर धरी बंसीकी पेरी, काहे न सूर निकाले ?।।३।।
तुकड्यादास कहे रँग आवे, हरि अपनो मुंह खोले ।।४।।