गिरिधर ! बंसि बजाई

(तर्ज : अब दिन बीतत नाही... )
गिरिधर ! बंसि बजाई ।।टेक।।
मैं जमुना - जल भरन चली थी, सुन मुरली घबराई ।।१।।
सुध बुध भूली अपने तनकी, दौरन लगि दिस दाही ।।२।।
कुजन बनकी गर्द छतामें, यह  आवाज   सुनाई ।।३।।
तुकड्यादास कहे गोपिनकी, आवागमन मिटाई ।।४।।