वाहवाह रे ! देश सुधारे हो
(तर्ज : जोगन खोजन निकली है...)
वाहवाह रे ! देश सुधारे हो । जीवन परका कर डारे हो ।।टेक।।
ग्यान पढो तो दुसरोंकाही, चाल चलो तो दुसरोंकी ।
इतिहासको जलवा डारे हो, नहि धर्मकी बाह सँबारे हो ।।१।।
कपडे हो तो जरीभरीके, जो परदेशके बूने हैं ।
गरिबोंको न फुटाने हैं, बिन कामसे उनको मारे हो ।।२।।
सवार हों तो हों मोटरपर, बैलकी हड्डियाँ दिखती हैं ।
पीना हो तो चाय कॉफिका, दूधकी गैया मारे हो ।।३।।
बात करो तो देश- भेषकी, तनपर जरा न खादी है ।
चाहते हैं आजादीको, पर गुलामिके ही प्यारे हो ।।४।।
हम तो कहते वे चालक है, जो गरिबनको पालेंगे ।
तुकड्या कहे वेहि निभावेंगे, स्वारथको, जलवा डारे हो ।।५।।