घट ही में प्रभु दर्शन पाये
(राग: जीवनपुरी, ताल : अध्था तिनताल..... )
घट ही में प्रभु-दर्शन पाये,रे मन!काहे फिरे बन-बन तू ।
नाहक काहे जात सताये ।।टेक।।
चिन्तन कर धर ध्यान गुरु को। मन ही मन सुमरे सुमरनको ।
कबहूँ झूठी राह न जाये ।।१।।
जो-जो मिलत जीव -जन कोई। प्रभु समान कर दे प्रभुताई ।
सब अपनी यह राह बताये ।।२।।
परनिन्दा परस्त्रिया-प्रिती । परधन हर न ये जाय अनीति ।
तुकड्या कहे यह निश्चय गाये ।।३।।